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Res. J. Language and Literature Sci., Volume 2, Issue (9), Pages 1-9, September (2015)


Research Paper

1. Objects, Symbols, and Their Thematic Roles in Virginia Woolfs to the Lighthouse
Hajjari Leila and Abjadian Amrollah, Res. J. Language and Literature Sci., 2(9),1-4(2015)

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Abstract
In this study, we have attempted to study objects, symbols and their thematic roles that Virginia Woolf has quite generously applied to the delicate fabric of her masterpiece, To the Lighthouse. Since symbols are indelibly intertwined with this novel's main enterprise, that is, the delineation of the reality behind the appearances of the phenomena, concepts, or beings, their examination for a better appreciation of the work in its entirety becomes crucial especially as the ebb and flow of time bestow each symbol with new shades of meaning. However, since symbols are apt to yield various amount of meanings, we have decided to concentrate on the thematic functions of the symbols in this novel.

Research Article

2. आर्य अनाथलयः फिरोजपुर छावनी पंजाब के संन्दर्भ में एक अवलोकन
अनूप सिंह, Res. J. Language and Literature Sci., 2(9),5-7(2015)

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शास्त्रों में कहा गया है कि परोपकारय संता विभूतयः इसका भावार्थ यह है कि परोपकार के लिए ही महापुरुषों का जन्म होता है। संत कवियों ने भी सेवा भाव की महान बताया है। मानव जीवन समाज सेवा कल्याण एवं परोपकार के कार्यों से ही महान एवं लोकप्रियता हासिल करता है। भारतीय द्रृष्टिकोण के अनुसार धर्म विज्ञान और दर्शनशास़्त्र सदा एक दूसरे के सहायक और सहयोगी रहे हंै। दर्शनशास्त्र विवेक और तर्क के मार्ग से सर्वोच्च सत्य तक पहुंचनें का प्रयत्न करता है। इसलिए दर्शन के बिना धर्म केवल एक मूढ विश्वास और भावुकता रह जाता है। और धर्म के बिना दर्शन केवल एक काल्पनिक बौद्विक प्रयास है जिससे कोई व्यवहारिक उपलब्धि नही होती है। योग के अभ्यास से बुद्वि तेज होती है और बौद्विक विकास सत्य के साक्षात्कार के लिए गहरी रुचि उत्पन्न करता है। विज्ञान और दर्शन परस्पर अपने अपने मार्ग से सत्य की खोज करते हैं। विज्ञान सत्य के अलग अलग अंग को लेता है। दर्शन सम्पूर्ण जीवन को एक साथ देखता है। मानव शरीर अनेक अलग-अलग शाखाओं कंे अनेक वैज्ञानिको की खोज का बिषय है,परन्तु वैज्ञानिक मानव जीवन के उद्वेश्य का अध्ययन दर्शनशास्त्र के लिए छोड़ देते है। विज्ञान निरंन्तर प्रगति पर - फिजिकस तक पहुंच जाता है। अणु और परमाणु शक्ति में बदल जाते है, फिर वे चेतना का रुप धारण कर लेते है। अन्ततः सभी विचार और क्रियाएं सत्य में स्थिर हो जाती है। हमें मानव पुरुषार्थ पर विश्वास करके विज्ञान दर्शन और धर्म के क्षेत्रो़ में अपनी खोजों से अपने अनुसंधान से जीवन को संम्पन्न करना चाहिए । महान दार्शनिक सुकरात ने कहा है कि ”अपने आप को जानो” प्राचीन ऋषिमुनि भी आत्म निरीक्षण एवं आत्म चिंतन का दर्शन बतातें है। स्वंय को जानना और आन्तरिक निरीक्षण कर उसका अध्ययन या चिंतन करना इतना आसान नहीं। इस कार्य में सबसे बड़ी बाधा हमारा खान-पान और रहन सहन है। वर्तमान जीवन शैली तो सामान्य जीवन जीने एवं सामान्य स्वास्थ्य के लिए भी होती है। इससे सात्विकता, सरलता, सादगी एवं नित्यनता का होना आवश्यक है।प्राचीन समय में मानव की जीवन शैली कुछ साकारत्मक सोच, आस्था मानवतावादी,परोपकारीपूर्ण,शरीर आत्मा और मन की शुद्वि, शक्ति एवं शांति से भरपूर था। उस समय मानव के खान- पान, रहन -सहन में स्वार्थ और आडम्बर नही था। इसलिए उस काल के लोग दीर्घ आयु को प्राप्त कर अपने परम लक्ष्य पुरुषार्थ चतुष्टय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति को प्राप्त करना चाहते थे। उनका आंतरिक शुद्व भाव उनके कार्य व्यवहार से स्पष्ट झलकता था।भारतीय द्रृष्टिकोण के अनुसार धर्म और विज्ञान का उद्व्रेश्य अपने-अपने क्षे़त्रों में जीवन में सत्य और नेकी को ढूंढना हैं, जिस प्रकार कला और साहित्य का उद्वेश्य जगत में आन्नद और सौन्दर्य को ढंूढना है, यही मानव जीवन के चरम लक्ष्य है। हमें मानव -पुरूषार्थ पर विश्वास करके विज्ञान, दर्शन और धर्म के द्वारा अपने जीवन को सम्पन्न करना चाहिए।

Short Communication

3. Mind and Mental Health in the view of Ayurved
C. Palaiah, Res. J. Language and Literature Sci., 2(9),8-9(2015)

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The present day concept of medicine is truly all embracing and much unlike what the popular mind conceives of it: as just the care and restoration of a sick person . It comprehends such diverse topics as counselling in marriage against the risks of heredity, prophylactic measures which also include social and environmental hygiene, the advice and training of the mentally retarded and so on. All the measures of the ever advancing front of Health Care are relevant here. When we realise this much breadth of the current understanding of Medicine, the usual interest a modern researcher in Medicines takes in such a reputed, ancient and all sufficient system as Ayurveda seems to be narrow. The poverty of such an attitude and the need to delve deep if not explore further here, is best illustrated from what we find on Mind and Mental health in Ayurveda.